आज फिर वहीँ से गुजरा


जितेन्द्र जोशी

जितेन्द्र जोशी

आज फिर वहीँ से गुजरा
जहां हम मिले थे
मुझे आज वो दोनों मिले
जो बिछड़े थे
वो गुस्साए
अलसाये
ऊब चुके
दर्द में रुके
कारवाई में लगे थे Continue reading

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सुना है…


कोई पहचान के पेड़ के नीचे
जगह बदलती छाव के नक्शों
में एक इन्सान के पौधे को देखा था
”बूटपॉलिश बूटपॉलिश”
बड़ा छोटासा पौधा था..
गर्मी से तप रहा था..सूरज से बच रहा था..
थोडा उसका बुरा लगा….थोडा किसीका गुस्सा आया..
मैंने बड़ी दयालु भाव से मेरे चमकीले जूते फिरसे चमकाए वहाँ..
मेरी नजर उसपे थी..उसकी मेरी बगल मे छुपी किताबो पे..
मैंने उसे एक किताब दी…. Continue reading

बैठ जाता हूं मिट्टी पे अक्सर…


बैठ जाता हूं मिट्टी पे अक्सर क्योंकि मुझे अपनी औकात अच्छी लगती है..
मैंने समंदर से सीखा है जीने का सलीक़ा, चुपचाप से बहना और अपनी मौज में रहना ।।
ऐसा नहीं है कि मुझमें कोई ऐब नहीं है पर सच कहता हूँ मुझमे कोई फरेब नहीं है
जल जाते हैं मेरे अंदाज़ से मेरे दुश्मन क्यूंकि एक मुद्दत से मैंने न मोहब्बत बदली और न दोस्त बदले .!!.
एक घड़ी ख़रीदकर हाथ मे क्या बाँध ली.. वक़्त पीछे ही पड़ गया मेरे..!! Continue reading

बिन बोले बिन कहे


बिन बोले, बिन कहे सुने
बस हाथों में हाथ धरे
चार कदम बस चार कदम
इक सांझ चलोगे साथ मेरे??
गीली हथेली थाम के हम
नब्जों की लय पर डोलेंगे
कदम-कदम की ताल मिले तो

मन ही मन खुश हो लेंगे
हर इक शिकायत गम वम सारे
दो पल को रख परे…
चार कदम बस चार कदम
इक सांझ चलोगे साथ मेरे??
शब्द हरामी
शब्द कमीने
शब्द ने सब नष्ट किया
शब्द खिलाड़ी
शब्द व्यपारी
शब्दों ने सब भ्रष्ट किया
पोंछ कर ये शाब्दों का मरहम
लेकर अपने जख्म चले
चार कदम बस चार कदम
इक सांझ चलोगे साथ मेरे??
मैं हूं स्त्री
तुम मेरे पुरूष
मैं नर हूं
तुम मेरी मादा
जो पूरा है वो सपना है
इक सपना हम आधा-आधा
ये गुत्थी पेचीदा आदिम
इसे सुलझाते हम क्यों मरें?
चार कदम बस चार कदम
इक सांझ चलोगे साथ मेरे??
बिन बोले बिन कहे सुने कुछ
बस हाथों में हाथ धरे….

– स्वानंद किरकिरे

कोई तो शहर होगा


कोई तो शहर होगा जहाँ गुनेहगार डरता होगा
कोई तो डरपोक ईमान से सरोकार करता होगा

क्या लाश को खुद चलके जाना होगा कब्र तक?
कोई तो स्याना कंधो का कारोबार करता होगा Continue reading

..( आमीन )..


हर रोज बहलाता हूँ बच्चे को चाँद दिखाकर
एक दिन मै जरुर दूँगा उसे खिलौना लाकर

मै अबतक नहीं सिख पाया माँ बाप से सबकुछ
वे चालाकी से डकारते है आधे पेट खाकर Continue reading

यादोंके बादल


जिंदगी मे जहर घुलाने आये
यादों के बादल रुलाने आये

गजल गायी थी शायरों के साथ
नज्म लिखी थी याद है वह रात
शमा बुझाकर, जलाने आये
यादों के बादल रुलाने आये Continue reading