सुना है…


Tanveer

कोई पहचान के पेड़ के नीचे
जगह बदलती छाव के नक्शों
में एक इन्सान के पौधे को देखा था
”बूटपॉलिश बूटपॉलिश”
बड़ा छोटासा पौधा था..
गर्मी से तप रहा था..सूरज से बच रहा था..
थोडा उसका बुरा लगा….थोडा किसीका गुस्सा आया..
मैंने बड़ी दयालु भाव से मेरे चमकीले जूते फिरसे चमकाए वहाँ..
मेरी नजर उसपे थी..उसकी मेरी बगल मे छुपी किताबो पे..
मैंने उसे एक किताब दी…. Continue reading

आता उनाड शब्द वळावयास लागले


आता उनाड शब्द वळावयास लागले !
..सारे लबाड अर्थ कळावयास लागले !

केले न मी उगीच गुन्हेगार सोबती
आरोप आपसूक टळायास लागले !

आली पुन्हा मनात नको तीच चिंतने ..
काही मवाळ चंद्र ढळायास लागले !

घायाळ मी असून रणी खूप झुंजलो
ज्यांना न घाव तेच पळायास लागले ! Continue reading

पाऊसवेळा


उनाडतू केस झटकलेस
चेहर्यावर पाऊस आला …
चेहरा झाकला हातांनी
ओंजळभर पाऊस आला…

पदर उडाला झुळकेने
वार्यावर पाऊस आला …
तू हसून पाहिलं जरा
काळजावर पाऊस आला… Continue reading

मेघांच्या कविता ……


पावसावर कविता लिहीण्याचा
मी प्रयत्न करतो
मग शहाणा म्हणता म्हणता
मीच वेडा ठरतो

कारण त्याचं रुप बघुन
कितींचे भरुन येतील उर
कित्येकांच्या ओठी फुटतील
नव-नवे सुर
अन् किती गावांत दाटतील
त्याचे उधाणलेले पूर
ह्याची त्याला फिकीर नसते
(अगदी तुझ्यासारखं) Continue reading

बैठ जाता हूं मिट्टी पे अक्सर…


बैठ जाता हूं मिट्टी पे अक्सर क्योंकि मुझे अपनी औकात अच्छी लगती है..
मैंने समंदर से सीखा है जीने का सलीक़ा, चुपचाप से बहना और अपनी मौज में रहना ।।
ऐसा नहीं है कि मुझमें कोई ऐब नहीं है पर सच कहता हूँ मुझमे कोई फरेब नहीं है
जल जाते हैं मेरे अंदाज़ से मेरे दुश्मन क्यूंकि एक मुद्दत से मैंने न मोहब्बत बदली और न दोस्त बदले .!!.
एक घड़ी ख़रीदकर हाथ मे क्या बाँध ली.. वक़्त पीछे ही पड़ गया मेरे..!!
सोचा था घर बना कर बैठुंगा सुकून से. . पर घर की ज़रूरतों ने मुसाफ़िर बना डाला !!!
सुकून की बात मत कर ऐ ग़ालिब….बचपन वाला ‘इतवार’ अब नहीं आता |
शौक तो माँ-बाप के पैसो से पूरे होते हैं, अपने पैसो से तो बस ज़रूरतें ही पूरी हो पाती हैं..
जीवन की भाग-दौड़ में – क्यूँ वक़्त के साथ रंगत खो जाती है ?
हँसती-खेलती ज़िन्दगी भी आम हो जाती है.. एक सवेरा था जब हँस कर उठते थे हम
और आज कई बार बिना मुस्कुराये ही शाम हो जाती है..
कितने दूर निकल गए, रिश्तो को निभाते निभाते.. खुद को खो दिया हमने,
अपनों को पाते पाते.. लोग कहते है हम मुस्कुराते बहोत है, और हम थक गए दर्द छुपाते छुपाते..
“खुश हूँ और सबको खुश रखता हूँ, लापरवाह हूँ फिर भी सबकी परवाह करता हूँ..
मालूम हे कोई मोल नहीं मेरा, फिर भी, कुछ अनमोल लोगो से रिश्ता रखता हूँ…

 – हरिवंश राय बच्चन